الله اکبر الله اکبر، لا اله الا الله و الله اکبر الله اکبر و لله الحمد الحمد لله على ما هدانا و له الشکر على ما اولاناआज शव्वाल की पहली तारीख़ है। यह वह दिन है जिसे अल्लाह के हुक्म से रोज़ा रखने वालों के लिए ईद का दिन निर्धारित किया गया है। इस शानदार दिन ईमान वालों के दिल ख़ुश भी हैं और दुखी भी। दुखी उस महीने के ख़त्म होने के कारण है जिसका हर क्षण रूहानियत व आध्यात्म से क़रीब और ख़ास ख़ूबसूरती का मालिक था और ख़ुशी उस ईद के आगमन लिए कि जो एक महीने तक लगातार रोज़ा रखने और आत्म संघर्ष के इनाम व बदले की शक्ल में सामने आई है।शव्वाल महीने की पहली तारीख़ का सूरज, मोमिनों के दिलों पर हमेशा से ज्यादा नूरानी बनकर दमक रहा है। रूह को शांति प्रदान करने वाली अल्लाहो अकबर की आवाज़ें हर मस्जिद और ईदगाह से कानों तक पहुंच रही हैं। ईदे फ़ित्र, मुवह्हिद (एकेश्वरवादी) एवं वफ़ादार बंदों पर अल्लाह की विभूतियों और उसकी कृपा की शुभ सूचना है। इस आसमानी ईद के सुबह सवेरे सबसे बड़े जेहाद अर्थात अपनी आंतरिक इच्छाओं से संघर्ष में कामयाबी हासिल करने वालों को इनाम हासिल करने के लिये इलाही आवाज़ बुलाती है। कितने ख़ुशक़िस्मत हैं वह लोग जिन्होंने, रमज़ानुल मुबारक और शबे क़द्र की विभूतियों की छाया में निष्ठा व ख़ुलूस के साथ इबादत करके, अपने मन और दिल से बुराइयों की धूल को साफ किया और अब इस बड़ी कामयाबी के उपलक्ष्य में ईद के समारोह आयोजित कर रहे हैं।इस महान दिन हम अल्लाह की महानता कै ज़िक्र करते हैं और संसार में करोड़ों मुसलमानों के साथ इस ख़ूबसूरत जुमले को दोहराते हैं,الله اکبر الله اکبر، لا اله الا الله و الله اکبر الله اکبر و لله الحمد الحمد لله على ما هدانا و له الشکر على ما اولاناअल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह के अतिरिक्त कोई मअबूद नहीं है। सभी प्रशंसा अल्लाह के लिए है कि उसने हमारा मार्गदर्शन किया और उसकी प्रशंसा है उसके लिए, जो हमें प्रदान करता रहता है।हालांकि रोज़ा सभी इलाही धर्मों में है लेकिन इन धर्मों में रोज़ों के ख़त्म होने पर ईद जैसा त्योहार नहीं होता। इस सम्बंध में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) का कहना है कि ईदे फ़ित्र अल्लाह की तरफ़ से मेरी उम्मत के लिए एक उपहार है। अल्लाह ने मुझसे पहले इस तरह का उपहार किसी दूसरे को नहीं दिया।यह इलाही उपहार पैग़म्बरे इस्लाम (स) के मक्के से मदीने हिजरत के दूसरे साल मुसलमानों को दिया गया। इस साल मुसलमानों के लिए फ़ितरा देने और ईद मनाने का हुक्म आया। पैग़म्बरे इस्लाम (स) इस दिन को बहुत महत्व दिया करते थे और अपने साथियों से भी हमेशा ही इस दिन के सम्मान की सिफ़ारिश किया करते थे। ईद के दिन मुसलमान अल्लाह शुक्र अदा करते हैं कि उन्होंने महान रमज़ानुल मुबारक के मुबारक महीने को अपनी क्षमता भर रोज़े, नमाज़ और दुआवों में गुज़ारा। ईद का दिन फ़ितरत की ओर पलटने का दिन है। निश्चित रूप से एक महीने तक आत्म प्रशिक्षण और दिल से बुराइयों तथा गुनाहों की धूल को हटाना, इंसान को आंतरिक सफाई तक पहुंचाता है। समय गुज़रने के साथ ही साथ हर इंसान की पाक फ़ितरत, जेहालत और बुराइयों के कारण विभिन्न तरह के गुनाहों में घिरकर अपनी वास्तविकता से दूर हो जाती है। इसके नतीजे में ख़ुद तथा अल्लाह को भूल जाती है लेकिन रमज़ानुल मुबारक के आते ही इंसान इस महीने के आध्यात्मिक माहौल में अपनी कोशिशों से नई ज़िंदगी हासिल करता है जिसे ख़ुद की ओर पलटने की संज्ञा दी गई है। मानों इंसान ने दोबारा जन्म लिया हो और वह इस पाक एवं नूरानी फ़ितरत तक पहुंच चुका हो जो जन्म के समय उसके पास थी। हज़रत अली अलैहिस्सलाम भी इसी दृष्टिकोण से इस दिन की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, यह ईद उसकी है जिसके रोज़ों को अल्लाह ने स्वीकार कर लिया और उसकी नमाज़ की प्रशंसा की है तथा हर वह दिन जिस दिन अल्लाह की नाफ़रमानी व अवज्ञा न की जाए वह ईद का दिन है।वह इसी तरह रमज़ानुल मुबारक के ख़त्म होने और ईद के आगमन के बारे में बड़े ही ख़ूबसूरत ढंग से कहते हैं, रमज़ान के आख़री दिन अल्लाह की तरफ़ से एक फ़रिश्ता पुकारता है कि हे अल्लाह के बंदों, अल्लाह की तरफ़ से ख़ुशख़बरी है कि अल्लाह ने तुम्हारे पिछले गुनाहों को माफ़ कर दिया इसलिए तुमको अब भविष्य तथा नई ज़िंदगी की चिंता करनी चाहिए कि तुम उसे किस तरह से गुज़ारोगे? जिस समय ईद का चांद निकलता है, फ़रिश्तों की आवाज़ें आती हैं कि ऐ ईमान वालो आओ और अपने इनाम हासिल करो। पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके अहलेबैत की हदीसों में मिलता है कि मुस्तहब है कि इंसान, ईदे फ़ित्र के दिन ज्यादा दुआ करे, अल्लाह को ज्यादा याद करे और इस दिन को काहेली और बेकार के कामों में न गुज़ारे तथा अल्लाह से दुनिया-आख़ेरत में अच्छाई की दुआ करे। इतिहास में मिलता है कि एक बार ईदे फ़ित्र के दिन इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने देखा कि कुछ लोग निर्थक खेलों में व्यस्त हैं और वह ऊंची आवाज़ों में हंस रहे हैं। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा, आज वह दिन है जब अल्लाह के बंदों को अल्लाह की इच्छा हासिल करने के लिए उसकी इबादत में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करने चाहिए। आज के दिन कुछ लोगों की जीत होगी और कुछ लोगों की हार। मुझको उन लोगों पर आश्चर्य होता है जो इस दिन को बेकार ही गंवा देते हैं। ऐसा दिन जिस दिन अच्छों को इनाम दिया जाएगा और बुरे घाटा उठाएंगे।ईद के दिन का सबसे ख़ूबसूरत सीन, बड़ी संख्या में लोगों का ईद की नमाज़ के लिए निकलना है। ईद के दिन सुबह से ही मोअज़्ज़िन की अल्लाहो अकबर की आवाज़ें गूंजने लगती हैं जो लोगों को ईद की नमाज़ के लिए दावत देता है। मुसलमान उम्मीद व आशा से भरे दिलों और ख़ुशी के साथ तेज़ तेज़ मस्जिदों और ईदगाहों की ओर बढ़ते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम (स) की हदीस है कि जब ईद आती है तो लोग खुले मैदानों की ओर जाते हैं और नमाज़ पढ़ने की जगह पर हाज़िर होते हैं। अल्लाह उनको कृपा की निगाह से देखता है और कहता है, हे मेरे बंदो तुमने मेरे हुक्म से रोज़े रखे और मेरे ही हुक्म से इफ़तार किया और मेरे ही लिए नमाज़ पढ़ी। उठ खड़े हो, पलट आओ कि तुम्हारे गुनाह माफ़ कर दिये गए। आज वह दिन है जब ईद की नमाज़ में दोनों हाथों को उठाकर लाखो दिल से अल्लाह का ज़िक्र करते हुए उससे दुआ करते हैं कि वही अच्छाई जो तूने अपने चहेते बंदों को दी है वही उन्हें भी दे और उन बुराइयों से जिनसे तूने इतिहास के महान और अच्छे लोगों को दूर रखा है उन्हें भी उससे दूर रख। वह भलाई, अल्लाह की इबादत तथा ज़िंदगी की समस्त बातों और कामों में उसे दृष्टिगत रखना है और सबसे बुरी बुराई, शिर्क और अल्लाह विरोधी तथा ग़ैर इलाही ताक़तों के सामने नतमस्तक होना और दूसरे का दास होना है। आशा है कि अल्लाह अपनी असीम कृपा से लाखों मुसलमानों की दुआओं को क़बूल करेगा और मुसलमानों को अपनी बंदगी में शामिल करेगा।ईद के दिन पढ़ी जाने वाली ख़ास नमाज़ में दोनों हाथ उठाकर नमाज़ी कहता हैः«اَللّهُمَّ اَهْلَ الْکبْرِیاءِ وَ الْعَظِمَة وَ اَهْلَ الْجُودِ وَ الْجَبَرُوتِ وَ اَهْلَ الْعَفْوِ وَ الرَّحْمَةِ وَ اَهْلَ التَّقْوی وَالْمَغْفِرَةِ اَسْئَلُک بِحَقِّ هذَا الْیَوْمِ الَّذِی جَعَلْتَهُ لِلْمُسْلِمینَ عیداً وَ لِمحَمَّد صَلَّی اللّهُ عَلَیْهِ وَ آلِهِ ذُخْراً وَ شَرَفاً وَ کرامَةً وَ مَزیداً اَنْ تُصَلِّی عَلی مُحَمَّد وَ آلِ مُحَمَّد وَ اَنْ تُدْخِلَنِی فی کلِّ خَیْر اَدْخَلْتَفیهِ مُحَمَّداً وَ آلَ مُحَمَّد وَ اَنْ تُخْرِجَنی مِنْ کلِّ سُوء اَخْرَجْتَ مِنْهُ مُحَمَّداً وَ آلَ مُحَمَّد صَلَواتُک عَلَیْهِ وَ عَلَیْهِمْ اَللّهُمَّ اِنّی اَسْئَلُک خَیْرَ ما سَئَلَک بِهِ عِبادُک الصّالِحُونَ وَ اَعُوذُ بِک مِمّا اسْتَعاذَ مِنْهُ عِبادُک الْمـُخْلَصُونَ».हे परवरदिगार, जो महानता और बड़प्पन का मालिक है, जो दानी व शक्तिशाली है, जो माफ़ करने वाला व कृपालु है, जो तक़वे व माफ़ी का मालिक है, मैं तुझसे आज के इस दिन के
8 अगस्त 2013 - 19:30
समाचार कोड: 450261
आज शव्वाल की पहली तारीख़ है। यह वह दिन है जिसे अल्लाह के हुक्म से रोज़ा रखने वालों के लिए ईद का दिन निर्धारित किया गया है। इस शानदार दिन ईमान वालों के दिल ख़ुश भी हैं और दुखी भी।